Wednesday, 18 October 2017

हिन्दू वीर जाटवान मलिक - धर्म के लिए प्रथम बलिदान

#हिन्दू_वीर_यौद्धा_जाटवान_सिंह_मलिक- पूरा पढ़ने के बाद आखिरी लाइन ध्यान से पढ़ना कि हमारे लिए महान कौन है?
#हिंदुत्व_के_लिए_बलिदान_देने_वाला_पहला_यौद्धा
बात 1192 की है जब देश पर मुस्लिम सत्ता की शुरुआत हुई थी।और गौरी का गुलामी में कुतुबुद्दीन ऐबक देश पर अघोषित राज कर रहा था।
➡ये वही कुतुबुद्दीन है जिसने 700 #मंदिर तोड़कर मस्जिदे बनाई,जिसने 1लाख 33000 लोगो का #धर्म के नाम पर कत्ल किया,जिसने 80000 #जीवो की हत्या की।

➡जाटो को ये #अत्याचारी अधर्मी राजा सहन नही हुआ और उन्होंने हिन्दू वीर यौद्धा 💪#जाटवान मालिक के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।
और मूसल सैनिकों को काटना शुरू कर दिया।#रोहतक_हरियाणा में जन्मे जाटवान ने युही ऐबक से लोहा लिया और फिर एक दिन  #हाँसी में मुस्लिम बादशाह के किलेदार #नसरुद्दीन को घेर लिया।और #हाँसी को इस अत्याचारी शासक से स्वतंत्र कर लिया।
तभी कुतुबुद्दीन खबर मिलते ही अपनी सेना के साथ रातों रात भागा।

हांसी पहुंचते ही जाटवान और मुस्लिम शासक के बीच घमाशान युद्ध शुरू हुआ।🏇⚔🏇
➡खुद मुस्लिम लेखक लिखते हैं कि जैसे दो पहाड़ आपस में टकरा गए हों।धरती रक्त से #लाल हो गई थी।जाट #थोड़े थे पर उन्होंने मुस्लिम बादशाह को नको चने चबवा दिए।
बाद में जाटवान ने अपने 💪20 मजबूत #सैनिकों को चुना और सीधा कतुबुद्दीन के सुरक्षा घेरे में घुस गया।
उसने तलवार से हजारों का रक्त बहा दिया और कतुबुद्दीन को हाथी से नीचे उतरकर लड़ने के लिए ललकारा।

➡पर वो #कायर उतरा नही और उसने मना कर दिया।

➡ये युद्ध #तीन_दिन और #तीन_रात चला।
आखिर कब तक दिल्ली के बादशाह की बड़ी सेना के आगे ये छोटी सी यौद्धाओं की सेना टिक पाती।
अंत में महान हिन्दू वीर चौधरी जाटवान सिंह मलिक #शहीद हो गए।

लेखक आगे लिखते है जाटवान भले ही शहीद हो गए हो पर गुलाम वंश मुस्लिम बादशाह को इतना नुकसान हुआ कि वो दहाड़े मार मार कर #रोया
और बोला कि अगर मैं इस यौद्धा से संधि करके बहला लेता तो अपने साम्राज्य का बहुत विस्तार कर सकता था।

इस तरह इस हिन्दू वीर यौद्धा ने देश और धर्म के लिए अपने प्राणों का #बलिदान दिया।ॐ🚩ॐ
पर कितने शर्म की बात है कि इस अत्याचारी कुतुबुद्दीन को #स्कूली किताबो में #महान बताया गया है

और धर्म व देश की खातिर तीन दिन तीन रात छोटी सी सेना के साथ इस गुलाम मुस्लिम बादशाह से लड़कर अपना बलिदान देने के बाद भी आज देश और हरियाणा के इतिहास में इस वीर को उचित जगह नही दी गई।

याद रखो इन बलिदानों को जिन्होंने अपना सिर कटा लिया पर कभी देश और धर्म का सिर नही झुकने दिया
               🚩🚩🚩🚩🇮🇳🚩🚩🚩🚩
           जय जाटवान।जय हिन्दुत्व।जय भारत

Friday, 16 June 2017

हिन्दू वीर महाराजा मालदेव एवं उनकी बेटी विरांगना राजकुमारी सोमादेवी चाहर।

सोमादेवी जाट
महाराजा मालदेव एवं उनकी बेटी विरांगना सोमादेवी चाहर

संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम चाहर व कानजी चाहर ने नसीरुद्दीन शाह के वारिस बादशाह गियासुद्दीन बलवन (1266 -1287) को पटाने के लिए पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी।और बलबन पहले से ही जाटो पर खुश था क्योंकि जब देश पर क्रूर विदेशी मंगोलों ने आक्रमण किया था तो खाप सेना ने ही उसके साथ मिलकर मंगोलों को हराया था।

इसलिए बादशाह ने उनकी इच्छा अनुसार कांजण (बीकानेर के पास) और सिद्धमुख(चुरू) का राज्य दे दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवन ने राज्य किया।(1268 से 1416 तक यहां जाट क्षत्रियो का राज रहा।)

बात उस समय की है जब वहां 1416 में राजा मालदेव चाहर शक्तिशाली स्तिथि में राज कर रहे थे।और इन्होंने अपना राज्य भी विस्तार कर लिया था।

वहां के आस पास दिल्ली के मुस्लिम बादशाह टैक्स लेते थे।और अपने कुछ लम्बरदार बना रखे थे।
तो 7 जाट लम्बरदारो ने टैक्स देने से मना कर दिया।

उस समय दिल्ली पर मुस्लिम शासक खिज्र खां का शासन था।उसने बाजखां पठान के नेतृत्व में एक सेना उन 7 लम्बरदारो को पकड़ने के लिए भेजी।जब बाजखां उन्हें गिरफ्तार करके ले जा रहा था तो राजा मालदेव ने उसे रोका।और उसे उन लम्बरदारो को छोड़ने के लिए कहा परन्तु उसने मना कर दिया।

फिर वहां भीषण युद्ध हुआ।और उस युद्ध में मुस्लिम सेनापति की सेना मारी गई।

इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -

माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात गोत के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।और इन्होंने खिज्र खां को टैक्स के लिए मना करके वीरता का काम किया क्योंकि उस समय ऐसा करना मौत के मुह में हाथ डालने के समान था।क्योंकि दिल्ली पर क्रूर शासकों का कब्जा था।

गुस्से में लाल होकर स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।

मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या राजकुमारी सोमादेवी थी। 
उसी समय दो सांड आपस में लड़ने लगे तो कुछ मुस्लिम सैनिक डरकर भागने लगे।
तब राजकुमारी सोमादेवी ने आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर दिया था।ये देखकर बादशाह के एक खास सेनापति की बुरी नजर उस पर पड़ी और उसने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा।

 स्वाभिमानी मालदेव ये सुनते ही गुस्से में हो गया और कहा कि हम अपनी कन्या एक मुसलमान को नही दे सकते।
महाराजा मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। 

चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में घोड़े पर तलवार लेकर वीरता से लड़ी।सोमादेवी ने हजारों मुस्लिम सैनिकों को काट दिया।

परन्तु इतनी विशाल सेना के आगे कब तक टिकते अंत में अपने धर्म पथ पर चलते हुए युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं लगभग सेना रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुई।

चाहर जाट गोत्र(एक नजर)
ऋषि-भृगु
वंश-अग्नि
कुलदेव-भगवान सोमनाथ
कुलदेवी-ज्वालामुखी

जय हिन्दुत्व।

Thursday, 15 June 2017

इन वीरों ने पीटा था नालंदा जलाने वाले बख्तियार खिलजी को-18000 को मारकर सिर्फ 800 मल्ल यौद्धा शहीद हुए खाप सेना के

हिन्दू वीर यौद्धा विजयराव बालियान और गोगरमल सिंह जाट

खाप बालान के गांव भाजू और भनेड़ा के बीच के जंगल की सभा - संवत् 1251 (सन् 1194 ई०) ज्येष्ठ सुदि तीज को भनेड़ा और भाजू के बीच के जंगल में सर्वखाप

पंचायत की एक विशाल सभा हुई। इस में सभी जातियों के लोगों ने भाग लिया जिनमें 30,000 लोग थे जिसमे 15,000 मल्ल (पहलवान) योद्धा शामिल थे। इस सभा में अधिक संख्या जाटों की थी। 

इस सभा का अध्यक्ष चौ० विजयराव जाट जो बालान खाप के गांव सिसौली का निवासी था, को चुना गया। इस समय मल्ल योद्धा सेना का प्रधान सेनापति गोगरमल जाट को बनाया गया।
ये दोनों ही बहुत ही वीर यौद्धा और रणनेता थे।

अध्यक्ष ने जोरदार भाषण दिया उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार है-

 “भारत माता के वीर योद्धाओ, अपने देश और हिन्दू धर्म की रक्षा तथा शत्रु को तलवार के घाट उतारना ही हमारा परम धर्म है। उसके लिए तैयार रहो। इस संकट के समय जनता और सैनिकों को उच्च चरित्र रखना पड़ेगा। मद्यपान से बचना पड़ेगा। सब जाति के लोगों को एक भाई बनकर रहना है। मुसलमान सेना के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार रहो।”

इस सभा में सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पास किए गये -

1.अपने देश, जनता तथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए मर मिटो।
2. गौरी जैसे अधर्मियों के अगले आक्रमण तथा उसकी लूटमार के बचावों के लिए सभी खापों से 60,000 से 100,000 तक वीरों की सेना तैयार करो।
3.चारों ओर फैली हुई बदअमनी के लिए शान्ति का वातावरण बनाओ और सब खापों में आपसी मिलाप एवं एकता करो।
4.विवाह-शादी के समय बारात के साथ हथियारबन्द रक्षक जत्थे जाने का प्रबन्ध किया जाये।

#कुतुबुद्दीन ऐबक को जासूसों द्वारा इस पंचायती कार्य का पता लग गया। उसने बख्तियार खिलजी (यह गौरी का एक गुलाम था जो खिलजी गोत्र का था) को 35,000 मुस्लिम सेना देकर सर्वखाप पंचायत पर आक्रमण करने के लिए भेजा। 

सर्वखाप पंचायत को भी यह सूचना मिल गई। पंचायती सेना चार भागों में बंट गई। जब बख्तियार की सेना वहां पहुंची तो पंचायती सेना मुस्लिम सेना पर चारों ओर से टूट पड़ी। ढ़ाई घण्टे तक घोर युद्ध हुआ। 

इस युद्ध में बख्तियार का सेनापति तथा 18,000 सैनिक मारे गये।विजयराव बालान और गोगरमल जाट अपने यौद्धाओं के साथ वीरता से लडे और दुश्मनों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा।

पंचायती सेना के केवल 800 मल्ल योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। मुस्लिम सेना रणक्षेत्र छोड़कर भाग खड़ी हुई और पंचायती सेना विजयी हुई।

इसी खिलजी ने बाद में नालन्दा विश्वविद्यालय को जलाया था अगर ये कायर इस दिन नही भागता तो इसका काम तमाम हो जाता और शायद नालन्दा विश्वविद्यालय आज हमारे सामने होता।

जय जाट क्षत्रिय। जय हिन्दुत्व।

Tuesday, 13 June 2017

धर्मरक्षक महाराजा सूरजमल- एक कविता

क्या-क्या करूँ बखान,
   लोहागढ़ के महाराजा सूरजमल तेरी शान का ...

ताना-बाना बुना हुआ है  ,
  आगरा , कानपुर ,हाथरस अलीगढ़, पानीपत और दिल्ली तक ,
     तेरे स्वाभिमान का ...

धर्म की रक्षा खातिर ,
    तोड दिया तूने दरवाजा लालकिले और मुगल अभिमान का ..

दिखा दिया था अपने तेज का ज्वर ,
    महज था तू जब 18 साल का ....

थी जयपुर के रण में 7 राज्यों की सेनायें ,
     छीन लाया ईश्वरी सिंह के लिये ताज अपने गुमांन का ...

न छोड़े मराठे न छोड़े मुगल ,
    लूट लाया वैभव उजड़ते सोमनाथ का ...

दिल्ली और आगरा के रास्तों में ,
       गरजता था आतंक तेरे नाम का .....

कहते थे कोई भुखा शेर ,
      इन राहों पर हिन्दू पेहरा करता था  ......तेरे नाम का 

अटल और अजब सहासी था ,
  दुश्मन सेना पर छोटा सा टुकड़ा भी भारी था ...तेरे नाम का 

सीखा था तूने एक बकरी से ,
             बच्चों की खातिर शेर से भिड़ना ,
   था तभी जनता का सच्चा हितैसी ... नहीं था सिर्फ नाम का 

नहीं उठी कोई बिकने वाली कलम ,
    इतना डर था इतिहास के पन्नों पर तेरे नाम का ...

नमन तुझे मेरा बारम्बार ,
   हे हिन्दू धर्म रक्षक ...... शोर रहेगा अमर हमेशा तेरे नाम का 

 जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की।

By-इंद्र सिंह


Monday, 12 June 2017

शहीद शिरोमणि महाराजा नाहर सिंह

वल्लभगढ़(हरियाणा)रियासत के राजा

वल्लभगढ़(फरीदाबाद-हरियाणा) एक बहुत ही शक्तिशाली जाट क्षत्रियों की रियासत थी जिसके संस्थापक हिन्दू महाराजा बलराम सिंह थे।वल्लभगढ़ और भरतपुर रियासतों ने मिलकर जिहादियों से धर्म की रक्षा की थी।उत्तर भारत में भरतपुर सबसे शक्तिशाली हिन्दू रियासत बनकर उभरी थी।महाराजा बलराम सिंह की 7 वीं पीढ़ी में 6 अप्रैल 1821 को इस महान प्रतापी राजा नाहर सिंह ने जन्म लिया था।उस समय देश पर अंग्रेजो का शाशन था।नाहर सिंह के बचपन का नाम नर सिंह था इनके ऊपर शिकार करते वक्त एक शेर ने हमला कर दिया था।तब नर सिंह और इनके अंगरक्षक हरचन्द गुर्जर ने शेर से टक्कर ली पर हरचन्द की मृत्यु हो गयी फिर नर सिंह ने शेर को मार गिराया।उस समय ये मात्र 16 साल के ही थे।तब इनका नाम नर सिंह से नाहर सिंह हुआ। उसके बाद उनका विवाह कपूरथला रियासत के सिख जाट राजा की पुत्री किशन कौर से कर दिया गया।  20 जनवरी 1839 को छोटी सी उम्र में उनका राजतिलक हुआ और राजा बनते ही उन्होंने सेना को मजबूत करना शुरू कर दिया।युवा नाहर सिंह ने अपनी सेना को यूरोपीय देशों की तर्ज पर प्रशिक्षित किया और इसके बाद उन्होंने घुड़सवारी सेना की कुशल प्रशिक्षित टुकड़ी तैयार की जो पलवल से दिल्ली तक गश्त करती थी।अंग्रेज इससे चीड़ गये थे परंतु उन पर हमला करने का साहस नही था।और जब भी उन्होंने साहस किया तब तब अंग्रेजो को मुह की खानी पड़ी।अंग्रेज ब्रिगेडियर शावर्स को हर बार हार का सामना करना पड़ा।यहां ठला कि अंग्रेज कलेक्टर विलियम को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा।

बल्लभगढ़ रियासत का उस समय नाम बलरामगढ़ था जो इसके संस्थापक महाराजा बलराम सिंह के नाम पर पड़ा था।इस रियासत की ओर आँख उठाने की अंग्रेजों हिम्मत भी नही पड़ती थी।महाराजा नाहर सिंह के नाम से अंग्रेज थर थर कांपते थे।उन्होंने अंग्रेजो के अपनी रियासत में घुसने पर भी प्रतिबंध का फरमान जारी कर दिया था जो उस समय बड़े बड़े राजाओं के भी बस की बात नही थी।इसी बीच 1857 की क्रांति की योजना शुरू हुई उन्होंने गुड़गांव रेवाड़ी ग्वालियर फरुखनगर के राजाओं को एक झंडे तले लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बल्लभगढ़ रियासत का महल

18 मार्च 1857 को मथुरा में राजाओं की एक गुप्त मीटिंग हुई जिसमें नाहर सिंह को शिरमौर बनाया गया और इस मीटिंग के आयोजक व अध्यक्ष वही थे।इस मीटींग में तात्या टोपे  भी शामिल थे।और बहादुर शाह जफर ने उन्हें दिल्ली के पश्चिमी हिस्से को चाक चौबंद रखने को कहा गया।क्रांति की तारीख 31 मई रखी गई थी ताकि सब तक खबर पहुंचाकर पुरे देश में एक साथ क्रांति की जाये।मगर क्रांति पहले ही शुरू हो गई।जिससे अचानक से सब गड़बड़ा गया।मंगल पांडे शहीद हो गए।और उनकी बटालियन के ज्यादातर सैनिक नाहर सिंह की सेना में शामिल हो गए।
क्रांति शुरू होते ही नाहर सिंह ने अंग्रेजो के काफिले रोकने शुरू कर दिए।इस तरह वीर क्रांतिकारियों ने दिल्ली को अंग्रेजो के कब्जे से छुड़ा लिया व बहादुर शाह जफर को दिल्ली का बादशाह बना दिया गया।
दिल्ली 132 दिन तक आजाद रही।अंग्रेजो ने पुनः दिल्ली पर कब्जा करने की रणनीति बनाई।परन्तु नाहर सिंह ने दक्षिण पश्चिमी पूर्वी सीमा की सुरक्षा की और अंग्रेजो को वहां से नही घुसने दिया।
अंग्रेज कर्नल लॉरेंस ने अपने गवर्नर को पत्र लिखा कि उत्तर पूर्व में राजा नाहर सिंह की मजबूत मोर्चाबन्दी है हम उस दीवार को तब तक नही तोड़ सकते जब तक हमे चीन या इंग्लैंड से कमुक न आ जाये।

इसलिए अंग्रेज उन्हें आयरन गेट ऑफ़ दिल्ली कहने लगे।अंग्रेजो ने फिर कुछ गद्दारो के साथ मिलकर योजना बनाई और दूसरी तरफ से जाकर दिल्ली पर हमला किया नाहर सिंह ने उन्हें आगे नही बढ़ने दिया परन्तु धूर्त अंग्रेजो ने एक और चाल चली के साथ ही वल्लभगढ़ पर हमला कर दिया।वहां वल्लभगढ़ के वीर वीरता से लड़े।जैसे ही राजा नाहर सिंह को ये सुचना मिली तो वो वल्लभगढ़ दौड़े।उसके बाद वो आगरा से आ रही अंग्रेजी सेना से भी भीड़ गये और अंग्रेजो को बुरी तरह से काट दिया।कई अंग्रेजो को बंदी बना लिया।अंग्रेजी सेना को जब अपनी हार दिखने लगी तो उन्होंने एक और चाल चली।
इसी बीच दिल्ली में बहादुर शाह जफर ने आत्म समर्पण कर दिया और अंग्रेजो ने झूठ ही युद्ध विराम का सफेद झंडा फहरा दिया।और बहादुर शाह के खास आदमी इलाहिबक्श जो गद्दार था को नाहर सिंह के पास भेजा गया।नाहर सिंह इन सब से अनजान थे।तो उस गद्दार ने महाराज को कहा कि आपको बहादुर शाह जफर ने बुलाया है अंग्रेजो से संधि की जायेगी।जब महाराज वहां पहुंचे तो नजारा कुछ और ही था।मौके का फायदा उठाकर धोखे से उन्हें 6 दिसम्बर 1857 को बंदी बना लिया गया।इस तरह धूर्त अंग्रेज अपनी चाल में कामयाब हो गए।
उन्हे अंग्रेजो ने कहा कि सत्ता वापिस कर दी जायेगी अगर अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करो तो।
नाहर सिंह ने तेवर दिखाकर जवाब दिया कि मैं वो राजा नही जो देश के दुश्मनों के आगे झुक जाऊं।और जो देश धर्म से गद्दारी करे वो जाट ही क्या?

फिर चांदनी चौक पर उन्हें फांसी देने का प्रबंध किया गया।दिल्ली की जनता वहां खचाखच भर गई और भारत माता की जय।महाराजा नाहर सिंह की जय के नारों से दिल्ली गूंज उठी।
अंग्रेज घबरा गए उन्होंने फांसी के फंदे पर भी राजा के सामने वही बात दोहराई।
पर उन्होंने साफ कहा इस देश का दुश्मन मेरा दुश्मन और मैं कभी दुश्मनों के आगे झुकता नही राज ही चाहिए होता तो मैं विद्रोह करता ही नहीं।
और दिल्ली की जनता को आह्वाहन करते हुए उन्होंने कहा कि देशवासियों एक चिंगारी पैदा करके जा रहा हूँ इससे आजादी की मशाल जलाए रखना।
एक नाहर सिंह मरेगा लाखो पैदा होंगे और इस अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकेगे।माँ भारती के हाथों में आजादी का झंडा शान से लहराना चाहिए।
और फिर भारत माँ की जय का नारा लगाकर उन्होंने हंसकर फांसी का फंदा चूम लिया।

इस तरह एक महान क्रन्तिकारी महाराजा नाहर सिंह अपनी वीरता और देशभक्ति का किस्सा हमारे बीच छोड़ गए।

वल्लभगढ़ का महल

आज उनकी याद में हर साल ये महत्वपूर्ण दिवस मनाए जाते हैं।उनके नाम से एक नाहर सिंह इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम है।और एक मेट्रो स्टेशन भी उनके नाम से है।उनके नाम पर हर साल मेला भी लगता है।

क्या आप जानते हैं अकबर की कब्र कहाँ है?

#क्या_आप_जानते_हैं_अकबर_की_कब्र_कहाँ_है?


असल में अकबर की कब्र पर बहुत ही भव्य मकबरा बनवाया गया था।मकबरा आज भी वहां है परंतु कब्र के साथ क्या हुआ पढिये-

लेकिन #राजाराम जाट ने वहां युद्ध करके हिन्दू विरोधी #अकबर और #जहांगीर की कब्र उखाड़कर उनकी अस्थियां बाहर निकाल कर हिन्दू रीती के अनुसार जलवा दिया था।

अकबर ने जीते जी अपना मकबरा बनवा लिया था पर उसने सपने में भी नही सोचा होगा कि उसके मरने के बाद भी उसके साथ ये हाल होगा।

आज अगर उनकी कब्र होती तो #सेक्युलर हिन्दू वहां #माथा टेकते मिलते।हमे गर्व है इस वीर पर जो आज उनके लिए उन अत्याचारियों की निशानी तक नही छोड़ी।

ढाही मसती बसती करी, खोद कबर करि खड्ड |
अकबर अरु जहाँगीर के , गाडे कढि हड्ड ||

जय हिन्दू वीर राजाराम जाट।जय हिन्दुत्व।