Tuesday, 13 June 2017

धर्मरक्षक महाराजा सूरजमल- एक कविता

क्या-क्या करूँ बखान,
   लोहागढ़ के महाराजा सूरजमल तेरी शान का ...

ताना-बाना बुना हुआ है  ,
  आगरा , कानपुर ,हाथरस अलीगढ़, पानीपत और दिल्ली तक ,
     तेरे स्वाभिमान का ...

धर्म की रक्षा खातिर ,
    तोड दिया तूने दरवाजा लालकिले और मुगल अभिमान का ..

दिखा दिया था अपने तेज का ज्वर ,
    महज था तू जब 18 साल का ....

थी जयपुर के रण में 7 राज्यों की सेनायें ,
     छीन लाया ईश्वरी सिंह के लिये ताज अपने गुमांन का ...

न छोड़े मराठे न छोड़े मुगल ,
    लूट लाया वैभव उजड़ते सोमनाथ का ...

दिल्ली और आगरा के रास्तों में ,
       गरजता था आतंक तेरे नाम का .....

कहते थे कोई भुखा शेर ,
      इन राहों पर हिन्दू पेहरा करता था  ......तेरे नाम का 

अटल और अजब सहासी था ,
  दुश्मन सेना पर छोटा सा टुकड़ा भी भारी था ...तेरे नाम का 

सीखा था तूने एक बकरी से ,
             बच्चों की खातिर शेर से भिड़ना ,
   था तभी जनता का सच्चा हितैसी ... नहीं था सिर्फ नाम का 

नहीं उठी कोई बिकने वाली कलम ,
    इतना डर था इतिहास के पन्नों पर तेरे नाम का ...

नमन तुझे मेरा बारम्बार ,
   हे हिन्दू धर्म रक्षक ...... शोर रहेगा अमर हमेशा तेरे नाम का 

 जय हिन्दू ह्रदय सम्राट महाराजा सूरजमल की।

By-इंद्र सिंह


5 comments:

  1. बेहद खूबसूरत रचना
    तारीफ के लिए शब्द नहीं
    बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ के साथ जाट राजवंश के महाराजा सूरज मल जी का बखान करने के लिए धन्यवाद

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  2. बहुत अच्छी कविता
    इसने मेरे मन को झकझोर कर रख दिया और गर्वांवित महसूस किया।।
    जय हुकुम की

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  3. जय हो वीर शिरोमणि महाराजा सूरजमल जी महाराज की हमें आपका बलिदान हमेशा याद रहेगा

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